यूँ लगने लगी है अब जहर जिंदगी,
तड़पा रही है कुछ इस कदर जिंदगी,

यंहा उजालों के पीछे अँधेरा है बहुत,
जाये भी तो जाये कैसे शहर जिंदगी,
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मनोज सिंह”मन”

manoj-singh

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