यू गुमसुम ना बैठा करो,कभी खुद में भी होया करो,
क्यों गुनाह दिल से हुआ,कभी तुम भी तो सोचा करो,

क्यों घुट घुट के जीते हो,यू अश्क अपने ही पीते हो, 
ये सिसकिया अच्छी नही,कभी खुल के भी रोया करो,

जिद्द इतनी भी अच्छी नही,यंहा कोई किसी का नही,
यूँ दिल ना लगाया करो,कभी दिल को भी रोका करो,

क्यू नींद से ये दूरी है, कुछ ख्बाब भी तो जरुरी है,
सितम आँखों पे अच्छा नही,कभी रातों में सोया करो,

क्या गुजरी है कैसे कहें,कि सितम हमने कितने सहें,
ए सितमगर ख़ुदा से डरो,ऐसे सितम किया ना करो,

दिल तोडा,मेरा उसी ने,जो कहता था मुझसे यंकी से,
हम तुम्हारे ही रहेंगे “मन”,बस तुम हम पे भरोसा करो,
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मनोज सिंह”मन”

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