बादशाह की मात को इक्के निकल आते हैं
पक्के वादे भी जब कच्चे निकल आते हैं

ये क़िताब-ए-ज़िंदगी और रिश्तों के धागे
धागे टूट जाएँ तो पन्ने निकल आते हैं

कभी किसी कोने में जगहा बच गई हो तो
दिल की दीवारों से छज्जे निकल आते हैं

यक़ीन तो होता नहीं मगर फिर भी यारो
झूठे लोग भी कई बार सच्चे निकल आते हैं

गम के घर से तो निकलो ज़रा यूँ ना बैठो
खुशियों के बहुतेरे अड्डे निकल आते हैं

बारिश में गिरते पानी का रंग न देखें वो
कागज़ की कश्ती लिए बच्चे निकल आते हैं

किसी को दूर से देखो तो यकीं ना करना
घास ढके मैदान में गड्ढे निकल आते हैं

–सुरेश सांगवान’सरु’

Facebook Comment

Internal Comment

Leave a Reply