“याचना नहीं अब………”

याद आ रही मुझको फिर
दिनकर की बात पुरानी वो। 
फिर दुहराई जाएगी
बीती हुई कहानी वो।

हर बार दोस्ती के वादे पर
खंज़र की मार सही हमने।
बार-बार हर बार यूँ ही
पितामह सी बात कही हमने।

शर्म नहीं है उसको जब
ऐसी काली करतूतों पर।
कुछ ऐसा क्यों न किया जाय
ये नाक रगड़ दें जूतों पर।

अगर नीतियाँ नहीं प्रबल
उनका शीश झुकाने को।
आदेश थमाँ दो वीरों को
काट शीश ले आने को।

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