दीवानों से उस बेगाने का ,रिश्ता लगता है,
मुझे चेहरे से वो पागल, फरिश्ता लगता है,

वो भी पहले हँसता था,कहते है सब लोग, 
अब जीना भूल गया हो जैसे,ऐसा लगता है,

उस टूटे दिल का भी है,अब बंजारों सा हाल,
वो शाख से टूटा आवारा,एक पत्ता लगता है,

सुना-सुना सा उसका, हर किस्सा लगता है,
एक पुरानी सी कहानी का,हिस्सा लगता है,

अब ख़ामोशी है राहों में,बिखरे है सब फूल,
किसी उजड़ी हुई बस्ती का,रस्ता लगता है,

जाने कोई कब समझेगा,जज्बातों का मौल,
कुछ लोगों को हर खिलौना,सस्ता लगता है,

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मनोज सिंह”मन

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