वो मृगनयनी चंचल चितवन सी, इठलाकर जब चलती है,
हर पग पे घुँघरू बजते हैं, हर पग पे पायल बजती है,
लगती वो जैसे आसमान की, परी कोई मचलती है, 
हर अदा पे घुँघरू बजते हैं, हर नाज़ पे पायल बजती है,

वो भोर की लाली सी उठकर, दिन की जैसे शुरुवात करे,
राग ललित ह्रदयामृत बरसाने जैसी कोई बात करे,
वो शीतल चन्द्र की रश्मि सी, चकोर से अपने मिलती है,
हर दर्श पे घुँघरू बजते हैं, हर मेल पे पायल बजती है,

हर पल हर क्षण, मन के आँगन, गूँजे है उसकी किलकारी,
मन की बगिया खिल जाती है, महके है दिल की फुलवारी,
इक भोली सी मुस्कान लिये जब मुझसे बातें करती है,
हर शब्द पे घुँघरू बजते हैं, हर वर्ण पे पायल बजती है,

झरते मोती अश्रु बन कर, जब दिल उसका दुःख जाता है,
मेरे मन मन्दिर के प्रांगण का, सूर्य अस्त हो जाता है,
कुछ रूठी सी क्रोधित सी वो, जब मुझसे शिकवे करती है,
हर डाँट पे घुँघरू बजते हैं, हर आह पे पायल बजती है,

वो छेड़े है मुझको ऐसे, शिशु हो कोई नटखट सी,
मैं छेड़ूँ उसको शरमाये, जैसे हो कोई छुईमुई सी,
ग़ुमनाम मुझे वो कहती है, श्रुतिपटल को झंकृत करती है,
हर शेर पे घुँघरू बजते हैं, हर गीत पे पायल बजती है,

वो गीले बालों से झरती, जल की बूँदों का झरना हो,
वो उलझी लटों का केशों की, मेरे चेहरे पर गिरना हो,
इक टुकड़ी बादल की, तपती… धरती पर वर्षा करती है,
हर बूँद पे घुँघरू बजते हैं, हर शाम पे पायल बजती है,

वो छूना उसका मन को मेरे, आन्दोलित कर जाता है,
आभास छुअन का उसकी मेरे, तन को कम्पित कर जाता है,
कम्पित हाथों से मेरे वो, वेणी गुँथवाया करती है,
हर स्पर्श पे घुँघरू बजते हैं, हर छुअन पे पायल बजती है,

होता समाप्त है दिवस मेरा, उसके निद्रा को जाने से,
मन होता उल्लासित मेरा, दर्श मुखारविन्द पाने से,
फिर धीरे-धीरे सुख स्वप्न में, खोकर साँसें भरती है,
हर स्वप्न पे घुँघरू बजते हैं, हर साँस पे पायल बजती है,

हाँ, वो मृगनयनी चंचल चितवन सी, इठलाकर जब चलती है,
मेरे मन की वीणा के हर इक, तार को झंकृत करती है,
. . . . . . . . .हर तार को झंकृत करती है,
हाँ, वो मृगनयनी चंचल चितवन सी, इठलाकर जब चलती है… ग़ुमनाम

 

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