गुल कहू,गुलबदन कहू,ए गुलनशी,तुझे क्या कहूँ,
जाँ कहू,जाने-जाँ कहू, ए जाने-मन,तुझे क्या कहूँ,

तुझको देखा है जब से,रब को भुलाया है तब से, 
तुम कहो तो,ए जानेजाना,तुमको ही मै ख़ुदा कहूँ,

देखा था दिलजलों को,इश्क में कुछ बदहाल सा,
अब ख़ुद भी डूबा इश्क में,मै किसी से क्या कहूँ,

गर मिल जाओ मुझे, मै मुश्किलों से समर करू,
ए हमनशी,हमनवां,तुम्हें जिंदगी का हमसफ़र कहूँ,

अब दिल ये चाहे,हर घड़ी,मुझको तेरा दीदार हो,
तुम जिंदगी हो,तुम बंदगी हो,और ज्यादा क्या कहूँ,

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मनोज सिंह”मन”

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