तेरा जाना दिल को कभी गँवारा ना हुआ,
ऐसा रूठा हमसे फिर कभी हमारा ना हुआ,

बहुत हसरत रही कि तेरे साथ चले हम,
बस तेरी और से ही कभी इशारा ना हुआ,

मौत अच्छी थी जिसने उठाया था मुझको,
जिन्दगी यू तेरा मुझे  कभी सहारा ना हुआ,

ताउम्र भटकती रही लहरों में कश्ती मेरी,
नसीबों को मयस्सर कभी किनारा ना हुआ,

वो ऐसा गया मेरी नजरों से बहुत दूर कंही,
नजरों को उनका फिर कभी नज़ारा ना हुआ,

क्यों दिल लगाया था तूने उस बेबफा से,
“मन”तेरा फिर कंही  कभी गुजारा ना हुआ,
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मनोज सिंह “मन”

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