देखें हवाएँ ले चलें अब कहाँ तक मुझे
मजबूरियों ने चलाया है यहाँ तक मुझे
-सुरेश सांगवान’सरु’

नहीं आसां नहीं है यहाँ सम्भल जाना
ज़िंदगी नहीं है मौसम का बदल जाना
—सुरेश सांगवान’सरु’  Read more

ऐ अन्ज़ान,
क्या कहा…,,
याद कर रहे हो…
हाय! भूल गये थे क्या?

कुछ आगो-चिंगारी खाक़ मिरी से माँगते हैं
ये लोग पानी भी सूखी नदी से माँगते हैं
–सुरेश सांगवान’सॅरू’

ऐ अन्ज़ान,
शिकवा तो यूँ करते हो जैसे तुम बस मेरे ही हो,
कभी खुद से पूँछों मेरे एल-एल.बी. करने का वजह क्या थी।

तुम लाख़ कोशिशें करलो ‘आकाश’, अब कभी ना हो पायेगी सुलह,
गर फ़िर भी मिलना चाहो, तो मिलते रहना एक अजनबी की तरह…

कल रात चुपके से दिसम्बर ने ये सरगोशीं की,
ऐ अन्ज़ान,
क्यूँ ना इक बार फिर तुम्हें हँसा दूँ जाते -जाते।

कोई सवाल ऐसा नहीं जवाब एक रखता हो,
आसमान सा तू कहाँ आफ़ताब एक रखता हो.
— सुरेश सांगवान’सरु’

मुहब्बत के सिवा जीने की तदबीर न देख,
रक़्स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर न देख.

–सुरेश सांगवान’सरु’

ऐ अन्ज़ान,
तुमने मुझसे और बदले में मैने,
ना जाने किस-किस से बेवफाई की।

मै जो भी हूँ,
जैसी भी हूँ,
बस तुम्हारी हूँ,
मुझसे ऐ अन्ज़ान,
मेरी जात ना पूँछो।

ऐ अन्ज़ान,
नवम्बर की तरह हम भी अलविदा कह देंगें इक दिन।
फिर ढूँढते फिरोगे हमें दिसम्बर की सर्द रातों मे।

लिखने को, कब लिखती हूं मैं
बस कागज़ पे दिल रखती हूं मैं
आभा..

सामने ये मेरे मंज़र नहीं होता
तू बसा गर दिल के अंदर नहीं होता

सुरेश सांगवान’सरु’

ऐ अन्ज़ान,
तुम्हारा भी कुछ कसूर है इस मेरी आवारगी में,
कि तुम्हारी याद जब आती है तो ये आज़मगढ़ शहर अच्छा नही लगता।

बोझ समझकर हाय उतार देते हैं
बेटी को कहाँ लोग प्यार देते हैं
—सुरेश सांगवान’सरु’  Read more

धोखा लगी मेरी मोहब्बत ज़माने को,
वो जो कईयों से कर रही है उसे प्यार कहते हैं….

इन्दर गुन्नासवाला

अपनी जगह खुश हूँ तेरा बीमार नहीं हूँ
उलझूँ किसी दामन से मैं वो खार नहीं हूँ

—सुरेश सांगवान’सरु’  Read more

वो ख़्वाब है हक़ीक़त बनता नज़र नहीं आता
ये ख़्वाब मिरा मरने तक मरता नज़र नहीं आता

—-सुरेश सांगवान’सरु’ Read more

दुनियां तमाम ख़रीद ली मेरी
नींद मगर भूल गये वो अमीर

—सुरेश सांगवान’सरु’ Read more