हर बार थामती हूं आंसुओं का दामन, पलकों की कगारों पर
रूसवा न कर दें सब्र को मेरे, कहीं बाहर निकल कर….

न जाइये अंधेरों को यूँ मेरा हम सफ़र करके
कई काम अधूरे बाक़ी हैं आ जाओ सहर करके

–सुरेश सांगवान’सरु’

दर्द लाख सही बेदर्द ज़माने में
मगर जाता भी क्या है मुस्कुराने में

सुरेश सांगवान ‘सरु

मोहब्बत करने वालों का मक्का भी मदीना भी
ताज दिलों की धड़कन है ज़ेवर भी नगीना भी

–सुरेश सांगवान ‘सरु’

बहती धारा के साथ बहो किनारा छोड़ दो
रखो यकीं खुद पे दुनियाँ का सहारा छोड़ दो

—-सुरेश सांगवान’सरु’

ये कौन न जाने दुआएँ दे रहा है
सूखे पत्ते को हवाएँ दे रहा है

–सुरेश सांगवान ‘सरु’

अगर लौटा सको तो वो हसीन पल दे जाना
जिसमें तुम हमारे और हम तुम्हारे थे..
आभा..

गर मै तेरे अन्दर कहीं ठहर गयी हूं
तो हर सांस के साथ तुझमें जी लूंगी
आभा..

ऐ अन्ज़ान,
जब मेरी जात से जी भर जाये तो बता देना,
मै आँख से आसूँ की तरह खुद ही निकल जाऊंगा।

घड़ी की सुई हूँ रुक जाना है इक दिन मुझे
वो वक़्त है साथ ज़माने के चलना है उसे

—सुरेश सांगवान ‘सरु’

हुई शब तो चाँद -सितारों को पहरेदार किया
उतर के पानी में दरिया को खुद ही पार किया
—-सुरेश सांगवान ‘सरु’

ऐ अन्ज़ान,
हम ना होंगे इस लखनऊ शहर में तो कौन मनायेगा तुम्हें,
ये बुरी बात है हर बात पर रुठा ना करों।

कहा हुआ अपनों का अब सुनाई देने लगा
छुपा हुआ था जो तुझमें दिखाई देने लगा

—सुरेश सांगवान’सरु’