यूँ लगने लगी है अब जहर जिंदगी,
तड़पा रही है कुछ इस कदर जिंदगी,

यंहा उजालों के पीछे अँधेरा है बहुत, Read more

ठिकाना ढूँढती बहती हवा सी लगती हूँ
ज़िंदगी से नहीं खुद से खफ़ा सी लगती हूँ

मुझ में बस गई है आकर किस ज़ोर से देखो Read more

तेरी याद ज़हर हो तो क्या करें
ज़ीस्त जब दूभर हो तो क्या करें
–सुरेश सांगवान ‘सरू’

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी Read more

अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
ऐसे जिद्दी हैं परिन्दें कि उड़ा भी न सकूँ

फूँक डालूँगा किसी रोज़ Read more

दोस्ती जब किसी से की जाये,
दुश्मनों की भी राय ली जाए,

मौत का ज़हर हैं फिजाओं में, Read more