क्या कहूँ दिल-ए-नादान से कैसे निजात करता हूँ,
अब तो आलम ये है खुद ही से बात करता हूँ।

तेरी बेरूखी का नतीज़ा ये कैसा हुआ, Read more

यादों को मिटाकर हक़ीक़त कर दो सनम
आओ पास आओ क़यामत कर दो सनम

—सुरेश सांगवान’सरु’

दिखाके इक झलक दिलबर इनायत कर दो
मिरे दिल पे आज कोई क़यामत कर दो
—सुरेश सांगवान’सरु’

समझता है के एक वही है शहर में दाना,
किस्मत बुलंद है उसकी जो हमसे नहीं मिला ।

हद-ए-इंतज़ार देखो क़यामत भी आ गयी,  Read more

समझता है के एक वही है शहर में दाना,
किस्मत अच्छी है उसकी जो हमसे नहीं मिला।

हद-ए-इंतज़ार देखो क़यामत भी आ गयी,  Read more

बरसों के बाद देखा इक शख्स दिलरुबा सा
अभी जहन में नहीं है पर नाम था भला सा

अबरू खिंचे खिंचे से आखें झुकी झुकी सी Read more