रोज़ हौसलाअफजाई होती है,
रोज़ उनकी गली में रुसवाई होती है।
कैसे बताऊँ ज़माने वालों को,
कितनी शिद्दत से बुलवाई होती है।

इसके तेवर तो देखो इंसान से तीखे
हौसला सीखे तो कोई मच्छर से सीखे

—–सुरेश सांगवान’सरु’

तुम क्या गये मिरे हौसले दम तोड़ चले
लो बैठ गये हम जहाँ तुम छोड़ चले
—suresh sangwan’saru’

हर एक बात को चुप-चाप क्यूँ सुना जाए
कभी तो हौसला कर के नहीं कहा जाए

तुम्हारा घर भी इसी शहर के हिसार में है Read more