इश्क की अदालत में हार मेरी लाज़िमी थी,
ये नादाँ दिल मेरा पैरवी उसकी करता रहा.
~ मनोज सिंह”मन”

इज़हार क्यों किया था, इकरार क्यों किया था,
जब जाना बहुत दूर, फिर प्यार क्यों किया था,

ना थी कोई रंजिश, और ना थी कोई शिकायत,
जब हार गया दिल तुझपे, ये वार क्यों किया था.
~ मनोज सिंह “मन”

क्या हार में क्या जीत में किंचित नही भयभीत में,
कर्तव्य पथ पर जो भी मिले जीत भी सही और हार भी सही !

फैसला कोई भी हो मैं हार ही जाऊँगी
दिल तेरे प्यार का मुद्दमा मुझसे जीता ना जायेगा