जश्न मना काफ़िर जरा, आज मौका ख़ुशी का है,
जला है घर मेरा अभी, ये नज़ारा उसी का है,

बातें लिखी है वादों भरी, इन रद्दियो के ढेर में, Read more

ऐ अन्ज़ान,
इससे बेहतर क्या सजा थी, जो वो देती मुझको।
कर गयी मुझको तनहा, मगर अपना बना के।

ऐ अन्ज़ान उससे कह दो कि मेरी सजा कुछ कम कर दें,
हम पेशे से वकील है मुज़रिम नही,
बस हमसे गलती से ईश्क हो गया था।