बुझे चराग़ में भी कुछ जला रखा है
ज़िंदगी में क्या जाने मज़ा रखा है

नहीं होता ज़ोर किसी का किसी पर  Read more

हमसे ये नुकसान उठना मुश्क़िल है
दिल से तुम्हें जुदा कर पाना मुश्क़िल है

हो जाएँ शुरू गर सिलसिले जुदाई के  Read more

बड़ा अजीब सा सिलसिला है मेरे नसीब का मेरे साथ
कश्ती पर बिठा कर मुझको सागर में सैलाब लाता है….
आभा….

ये जो सिलसिला शुरू हुआ है मेरे भारत वर्ष में रिश्वतों का,
ऐ अन्ज़ान तुम भी कुछ ले देकर मेरे क्यों नही हो जाते…