सच कहूँ तो…
फ़ुरसत ना थी उनको,
कुछ हम भी मग़रूर थे,
नाम उनका भी कुछ कम ना था,
कुछ हम भी “वकील साहब” मशहूर थे।

ऐ अन्ज़ान उससे कह दो कि मेरी सजा कुछ कम कर दें,
हम पेशे से वकील है मुज़रिम नही,
बस हमसे गलती से ईश्क हो गया था।

किसी मोहब्बत वाले वकील से ताल्लुक है क्या?
मुझे अपना महबूब अपने नाम करवाना हैं..!!  Read more