ऐ अन्ज़ान,
जब से वकालत में आया हूँ, मेरी नींद भी अजीब हो गई है,
रात भर आती नही, और दिन भर जाती नही।

ऐ अन्ज़ान,
इस वकालत के पेशे में हर तरीका हमने आजमा के देखा है,
जो किस्मत से नही मिलते, वो किसी कीमत पर नही मिलते।

हम वकालत के पेशे में है,
हम से सबूतों गवाहों की बात ना कर,
हम जहां बैठते कोर्ट वही लग जाती है।

ऐ अन्ज़ान, क्या बँटवारा था हाथ की लकीरों का भी,
उसके हिस्से में जज की कलम और मेरे हिस्से में वस वही वकालत।

आगे चलके वकालत मे कुछ इस तरह बूनूंगा कानून के धागे,
कि अच्छे-अच्छे जजों को झुक जाना पड़ेगा मेरे आगे।
-अतुल यादव
एल-एल.बी.