इक ज़रा सी ज़िंदगी में इम्त्तिहां कितने हुये
बोलने वाले न जाने बेज़ुबाँ कितने हुये

ध्रुव तारा ज़िंदगी का कौन होता है कहीं  Read more

जो लफ्ज़ पढ लिये है आंखो ही आंखों में
उनके लबों से सुनने की तमन्ना है बस….
आभा..

तुम हमेशा के लिए हमारे हो जाओ अब तो हर रोज बस दुआ यही करते हैं
एक तुम्ही हो जिस पर हम दिलो जान से मरते हैं
माना हम नहीं करते मोहब्बत अपनी लफ्जों मे बंया
लेकिन इतना समझ लो के बेइतंहा मोहब्बत तुमसे करते हैं।

लगता है कि अब ठहर जाऊं मैं
चलते चलते अब थम जाऊं मैं
मैं नदिया हूँ तो मुझे मिलना ही होगा  Read more

देखना मैं एक दिन चली जाउंगी
तुम्हारे लिए लफ्ज़ छोड़ जाउंगी
जो गिले शिकवे है आज कर लो
कल बहुत दूर निकल जाउंगी….
आभा….

तेरे ज़िक्र से ही संवर जाते हैं-
लफ्ज़ भी क्या तुझे छू आते हैं-
आभा….

हर गली हर कूचे में बाग़बान मिल जाये
गर इंसान के भीतर इंसान मिल जाये

उधार ना सही नक़दी दुकान मिल जाये  Read more

ऐ अन्ज़ान,
कभी लफ्ज़ भूल जाऊं, तो कभी बात भूल जाऊं,
तुमको इस कदर चाहूँ कि अपनी ज़ात भूल जाऊं,
उठ के तेरे पास से जब जाने लगूँ मै,
जाते हुए खुद को मै तुम्हारे पास भूल जाऊं।

यूं भी जी लूंगी बस जिये जाने तो दो
काटूंगी बलायें ज़रा लफ्जों पे धार आने तो दो

अंधेरा मुंह छुपा के भाग जायेगा  Read more

ना लफ़्ज़ों का लहू निकलता है ना किताबें बोल पाती हैं,
मेरे दर्द के दो ही गवाह थे और दोनों ही बेजुबां निकले…

रोज़ मैं जाने कहाँ ग़ुम हो जाती हूँ
खुद से निकल कर खुद में खो जाती हूँ

लफ्ज़ घूमते रहते हैं मेरे चारों तरफ Read more

क्या कहूँ किसी एक को दिल ये ज़रा-ज़रा सबने तोड़ा
कुछ थे  मेरे  अपने  और  ज़रा- ज़रा  रब ने तोड़ा

देखा  है जब  भी ग़ौर से  इनसां  को  मैने किसी Read more

मेरे लफ़्ज़ों की पहचान अगर कर लेता वो ‘फ़राज़’
उसे मुझसे नहीं खुद से मुहब्बत हो जाती…