ऐ अन्ज़ान,
क्या कहा…,,
याद कर रहे हो…
हाय! भूल गये थे क्या?

झुकी हुई नजरों से,मुस्कुराना तेरा,
बहुत याद आ रहा, मिल के जाना तेरा।

वो नजाकत औ शरारत, कि अब तक याद है,  Read more

“याचना नहीं अब………”

याद आ रही मुझको फिर
दिनकर की बात पुरानी वो।  Read more

रोज़ तेरा इंतजार करती हूं
रोज़ तेरा एतबार करती हूं
तू आ पाये या न आये पर
तिरी महक में डूबी रहती हूं
आभा चन्द्रा

चाँद मुखबिर है तुम्हारा, तो होने दो
याद में नैना मुस्करायें है शब भर
आभा..

यादों की कतरन जोड़ कर मैं आंचल बुन रही हूं
वक्त का रेशम धागा लेकर इक इक लम्हा चुन रही हूं
आभा..

मेरी खिड़की पर जा बैठा
अजनबी सा ये सूनापन
घेर लेता है अक्सर ही Read more

ऐ अन्ज़ान,
तुम्हारा भी कुछ कसूर है इस मेरी आवारगी में,
कि तुम्हारी याद जब आती है तो ये आज़मगढ़ शहर अच्छा नही लगता।

यादों को मिटाकर हक़ीक़त कर दो सनम
आओ पास आओ क़यामत कर दो सनम

—सुरेश सांगवान’सरु’

ना किसी की यादों ने सताया कभी
ना कभी दिल टूटा हैं
हमारा दिल तो वो पानी है दोस्तों
जो अपनी मस्ती मे बहता है
फिर भी ना जाने क्यू ख्याल आजकल किसी अजनबी का रहता है।

तुमको छोड़ के जिस दिन मैं, दूर कहीं चला जाऊँगा।
आँखों में… मैं बनके आँसु याद बहुत तुम्हें आऊँगा।
इन्दर गुन्नासवाला

यादें तेरी भूलु कैसे मुझको तुम बतला जाओ,
बैठु में आँखें बंद करके और पास मेरे तुम आ जाओ।

जब सोंचु में तुमको ये दूरी मुझको डँसती है,
इस दूरी के मौसम को आकर के तुम झुठला जाओ।

-इन्दर गुन्नासवाला

मेरे दिल का वही कोना जागता रहता है
जहां तेरी यादों का सफर साथ रहता है.
आभा..

इश्क़ में हमारी बे-ज़ुबानी देखते जाओ
उस पर आलम की तर्जुमानी देखते जाओ

तुम ना आओगे कभी मुन्तज़िर हम फिर भी हैं  Read more

तेरी यादों को सिरहाने लगा कर सोयी थी मैं,
जब जागी तो सारा ज़हन महक रहा था…
आभा….

ऐ अन्ज़ान,
तुम्हारी यादों की मिट्टी में,
आज फिर उन जख्मी लम्हों को दफ़ना कर आया हूँ।

तेरी याद ज़हर हो तो क्या करें
ज़ीस्त जब दूभर हो तो क्या करें
–सुरेश सांगवान ‘सरू’

उन नादानियों के दौर से यूँ हम भी गुज़रे थे,
अब क्या बताये आपको कि कैसे बिखरे थे,

शिकवे शिकायत रूठना रोज़ की बात रही,  Read more

उन नादानियों के दौर से यूँ हम भी गुज़रे थे,
अब क्या बताये आपको कि कैसे बिखरे थे,

शिकवे शिकायत रूठना रोज़ की बात रही,  Read more

इतना खुदगर्ज़ भी नही हुआ, तेरे जाने बाद,
कि तेरी यादों को भी, अब दिल से निकाल दूँ.
~ मनोज सिंह”मन”