देखें हवाएँ ले चलें अब कहाँ तक मुझे
मजबूरियों ने चलाया है यहाँ तक मुझे
-सुरेश सांगवान’सरु’

दिल के जख्मों पर, मलहम लगा दिया,
वरना नासूर हो जाता, तो क्या करता।

नामूमकिन ख्वाबों को, खामोश कर दिया,  Read more

सब के कहने से इरादा नहीं बदला जाता
हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता

हम तो शायर हैं सियासत नहीं आती हमको  Read more

माना महरूम हुये है हम तेरी चाहत से,
मगर यकीं उठा नही है अभी मोहब्बत से,

जब भी दिख जाओगे कंही राहों में हमें, Read more

हमारी आँख में रह कर भी हमसे दूर कितने हैं
उनके पास होकर भी हम मजबूर कितने हैं
दिल धड़कता है तो आवाज़ गुंजती है
उनकी याद में रहकर के हम खामोश इतने हैं

हमारी आँख में रह कर भी हमसे दूर कितने हैं
उनके पास होकर भी हम मजबूर कितने हैं
दिल धड़कता है तो आवाज़ गुंजती है
उनकी याद में रहकर के हम खामोश इतने हैं

बिन बात भी दूरियाँ हो जाती हैं कई बार
ज़िंदगी में मजबूरियाँ हो जाती हैं कई बार.

रोने में इक ख़तरा है, तालाब नदी हो जाते हैं
हंसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़्मी हो जाते हैं

इस्टेसन से वापस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं Read more

लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में

और जाम टूटेंगे, Read more

मैंने तुम्हारी मजबूरियां समझी और तुम्हे जाने दिया,
अब तुम भी मेरी मजबूरी समझो और वापस आ जाओ… Akash