पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं
ज़मीं जहाँ भी खुले घर निकलने लगते हैं

मैं खोलता हूँ सदफ़ मोतियों के चक्कर में  Read more

समझता है के एक वही है शहर में दाना,
किस्मत बुलंद है उसकी जो हमसे नहीं मिला ।

हद-ए-इंतज़ार देखो क़यामत भी आ गयी,  Read more

आता है यहाँ सबको बुलंदी से गिराना,
वो लोग कहाँ हैं जो गिरतों को उठाएं ?

ना इतराओ इतना,बुलंदियों को छूकर,
वक़्त के सिकंदर, पहले भी कई हुये,

जंहा होते थे कभी, Read more

बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है

बहुत जी चाहता है कैद ए जाँ से हम निकल जायें
तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती है…

-मुनव्वर राना

झूठी बुलंदियों का धुँआ पार कर के आ
क़द नापना है मेरा तो छत से उतर के आ

इस पार मुंतज़िर हैं तेरी Read more