हर बार थामती हूं आंसुओं का दामन, पलकों की कगारों पर
रूसवा न कर दें सब्र को मेरे, कहीं बाहर निकल कर….

अरसा हुआ तेरी बांहो से छूटे हुये मगर
बंद पलकों में हर सांस महकती है..
आभा..