नहीं अच्छे लगते उन वादों जैसे दिन,
कहां गए वो फरिश्ते जिन्होंने वादे किए थे।

ये ज़र, ये जमीं, ये सारे एहतमाम,
अदावत हैं यहीं के, वरना कहां से लाया था मैं।

इस मर्तबा सफर यूँ बेकार रहा,
उनकी गली में भी उनका दीदार न हुआ।

छोड़ आया उसकी गली भी, मयखाना भी,
जबसे पता चला वहां बेकदरे आने लगे।