कल रात चुपके से दिसम्बर ने ये सरगोशीं की,
ऐ अन्ज़ान,
क्यूँ ना इक बार फिर तुम्हें हँसा दूँ जाते -जाते।

ऐ अन्ज़ान,
नवम्बर की तरह हम भी अलविदा कह देंगें इक दिन।
फिर ढूँढते फिरोगे हमें दिसम्बर की सर्द रातों मे।

ठंडी हवाएं क्या चली मेरे शहर में,
हर तरफ यादों का “दिसंबर” बिखर गया…♥