ठोकरें जब ज़ीस्त दर-बदर खाती है
तमन्ना का क्या है बदल जाती है

–सुरेश सांगवान’सरु’

जो लफ्ज़ पढ लिये है आंखो ही आंखों में
उनके लबों से सुनने की तमन्ना है बस….
आभा..

आह को चाहिए इक उम्र, असर होने तक
कौन जीता है तिरी जुल्फ के सर होने तक

दामे हर मौज में है, Read more