ये किस मक़ाम पर जाने तक़दीर मुझे ले आई है
मन तन्हा टूटी कश्ती और फलक़ पे तन्हाई है
–सुरेश सांगवान’सरु’

बड़ा अजीब सा सिलसिला है मेरे नसीब का मेरे साथ
कश्ती पर बिठा कर मुझको सागर में सैलाब लाता है….
आभा….

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है,

रोज़ मैं अपने लहू से उसे ख़त लिखता हूँ, Read more

मिट्टी के घरोंदे है, लहरों को भी आना है,
ख्बाबों की बस्ती है, एक दिन उजड़ जाना है,

टूटी हुई कश्ती है, Read more