ऐ अन्ज़ान,
जब से वकालत में आया हूँ, मेरी नींद भी अजीब हो गई है,
रात भर आती नही, और दिन भर जाती नही।

ऐ अन्ज़ान,
इस वकालत के पेशे में हर तरीका हमने आजमा के देखा है,
जो किस्मत से नही मिलते, वो किसी कीमत पर नही मिलते।

ऐ अन्ज़ान बाबू,
जो खुद बदनाम है आज़मगढ़ शहर में,
वो… अब हमें बताता है जीने का तरीका।

ऐ अन्ज़ान,
मै जो देखता हूँ, वो ही बोलने का आदी हूँ,
मै अपने आज़मगढ़ शहर का सबसे बड़ा फ़सादी हूँ…

ऐ अन्ज़ान,
हम फिर आयेंगें तुम्हारे लखनऊ शहर,
अभी तो हमें और जलील होना बाकी है।

सुप्रभात

नये रिस्तों से बंधन, कुछ बेगाने हो गये,
अनजाने अपने हुए, अपने अनजाने हो गये।  Read more

ऐ अन्ज़ान,
जब मेरी जात से जी भर जाये तो बता देना,
मै आँख से आसूँ की तरह खुद ही निकल जाऊंगा।

ऐ अन्ज़ान,
हम ना होंगे इस लखनऊ शहर में तो कौन मनायेगा तुम्हें,
ये बुरी बात है हर बात पर रुठा ना करों।

ऐ अन्ज़ान,
क्या कहा…,,
याद कर रहे हो…
हाय! भूल गये थे क्या?

ऐ अन्ज़ान,
शिकवा तो यूँ करते हो जैसे तुम बस मेरे ही हो,
कभी खुद से पूँछों मेरे एल-एल.बी. करने का वजह क्या थी।

कल रात चुपके से दिसम्बर ने ये सरगोशीं की,
ऐ अन्ज़ान,
क्यूँ ना इक बार फिर तुम्हें हँसा दूँ जाते -जाते।

ऐ अन्ज़ान,
ये दिल आज अजीब सी उलझन में उलझा है,
तुम्हे खोना भी नही चाहता,
और तुम्हारा होना भी नही चाहता।

ऐ अन्ज़ान,
तुमने मुझसे और बदले में मैने,
ना जाने किस-किस से बेवफाई की।

मै जो भी हूँ,
जैसी भी हूँ,
बस तुम्हारी हूँ,
मुझसे ऐ अन्ज़ान,
मेरी जात ना पूँछो।

ऐ अन्ज़ान,
नवम्बर की तरह हम भी अलविदा कह देंगें इक दिन।
फिर ढूँढते फिरोगे हमें दिसम्बर की सर्द रातों मे।

ऐ अन्ज़ान,
तुम्हारा भी कुछ कसूर है इस मेरी आवारगी में,
कि तुम्हारी याद जब आती है तो ये आज़मगढ़ शहर अच्छा नही लगता।

ऐ अन्ज़ान ,
कल जो इश्क सस्ता बहुत मिला था,
आज वहीं इश्क महँगा भी बहुत पड़ा है।

ऐ अन्ज़ान,
तुम्हारी यादों की मिट्टी में,
आज फिर उन जख्मी लम्हों को दफ़ना कर आया हूँ।

ऐ अन्ज़ान,
इससे बेहतर क्या सजा थी, जो वो देती मुझको।
कर गयी मुझको तनहा, मगर अपना बना के।

चले जाना तुम भी इस प्रयाग नगरी से,
जब भी चाहना,
चले जाना….
ऐ अन्ज़ान,
बस इतनी सी गुजारिश है कि इस संगम तट पर..
मेरी साँसें बिखरने तक मेरे रह जाओ?
अतुल अन्ज़ान
एल-एल.बी