बागों में विविध पुष्प और मनभावन उनकी लाली,
भर गया सलिल चहुँ ओर दिखती हर दिश ही हरियाली।
पतझड़ में उजड़े पत्ते आए,भर गई पात से डाली, 
झर-झर करता नीर धाम से,कल-कल करती नाली।
सावन आया वनमाली।

कहीं पपीहा राग अलापे,कहूँ कोकिल स्वर वाली,
नाँच उठे वनमोर कहीं पर,कहीं घहर घन वाली।
कुन्ज-कुन्ज हिलोरें लेतीं,बही पवन मतवाली,
उपवन की रंग-बिरंगी कलियाँ, खुलीं सुवासों वाली।
सावन आया वनमाली।

Facebook Comment

Internal Comment

Leave a Reply