समझता है के एक वही है शहर में दाना,
किस्मत बुलंद है उसकी जो हमसे नहीं मिला ।

हद-ए-इंतज़ार देखो क़यामत भी आ गयी, 
कुछ इस तरह गया वो फिर हमसे नही मिला ।

वो क्या ख़ता हुई इसी कश्मकश में हूँ,
रूठा वो इस कदर के फिर हमसे नही मिला ।

अमावस की रात मुझपर कुछ इस तरह से छायी,
दीदार-ए-माहताब फिर हमको नही मिला ।

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2 comments on “Samajhta Hai Ke Ek Wahi Hai Shahar Mein…

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    Thanks Kavita !

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    Accha prayaas Amitabh ji.

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