समझता है के एक वही है शहर में दाना,
किस्मत अच्छी है उसकी जो हमसे नहीं मिला।

हद-ए-इंतज़ार देखो क़यामत भी आ गयी, 
कुछ इस तरह गया वो फिर हमसे नही मिला।

वो क्या खता हुई इसी कश्मकश में हूँ,
रूठा वो इस कदर के फिर हमसे नही मिला।

अमावस की रात मुझपर कुछ इस तरह से छायी,
दीदार-ए-माहताब फिर हमको नही मिला।

 

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6 comments on “Samajhta Hai Ke Ek Wahi Hai…

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    Lovely lines

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    बहुत बहुत शुक्रिया कविता ।

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    बहुत ही अच्छी ग़ज़ल । मतला और मख़ता दोनों ही बहुत खूब हैं ।

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