एक सूनी अकेली राह चलती
चेहरे पर मुस्कान चस्पां किये
राह की झाड़ियों से रिवाज़ों
को परे करती हुयी
ख़ून-आलूदा पैरों से रीतियों
के कांटे खींचती हुयी
एक सूनी अकेली राह चलती
कदम कदम पर कुंडली मारे
बैठा निठल्ला समाज
मकड़ियों के जालों सा लपेटता
अहंकारित पौरूष राज
एक सूनी अकेली राह चलती
कानों में गिरता पिघला सीसा
रोकने की नाकाम कोशिश
चेहरे पर चिपकी गलीज़ आंखों
की पुरज़ोर सी साज़िश
एक सूनी अकेली राह चलती
एक डरावना भयावह सन्नाटा सब
कुछ छिन जाने का डर
रोज़ एक नयी मौत मरने का ख़तरा,
फिर भी जीना तो है मगर
एक सूनी अकेली राह चलती
चेहरे पर मुस्कान चस्पां किये
आभा चन्द्रा…

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