साये उतरे, पंछी लौटे , बादल भी छुपने वाला है
लेकिन मैं वो टूटा तारा, जो घर से जाने वाला है

फिर सुबह हुई आँखें खोलें , कपड़ें बदले , फीते बांधे
उस शहर के बारे में सोचे , जो शहर अब आने वाला है

कल शब एक वीरा मसजिद में उसने मेरे आँसू पोंछे
जो सबकी सूखी शाखों पर फूल खिलाने वाला है

दिल के ये दोनों दरवाजे कभी नहीं बे-नूर हुए
सदियों से इस उजड़े घर में , एक दीया जलाने वाला है

मैं वो शबनम , जो फूलों की आँखों में रहे और ये सोचे
ऐसा लगता है , जैसे अब सब हाथ से जाने वाला है

हम रेत के जलते जर्रे को ये धूप ही चमकाए वरना
दर्या कतराने वाला है, बादल तरसाने वाला है

जुगनू चमके, तो मैं चौकू , तारा निकले , तो मैं सह्मू
जैसे हर कोई मेरे ही घर आग लगाने वाला है

जिस छप्पर के नीचे गावों के बूढ़े हुक्का पीते हैं
उस छत पे एक पागल लड़का अब आग लगाने वाला है

जिस आईने को पर्स में तुम रखे फिरते थे, टूट गया
ये धूप की शीशा आँखों पर नेज़े चमकाने वाला है

-बशीर बद्र

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