कांटे रहे उस राह में,जख्मी है कदम अबतक,
प्यार जिंदा है मगर और,जिंदा है हम अबतक,

तेरे सिवा किसी और को,कभी न चाहेंगे सनम, 
कसम हमसे न टूटी नही है,वो कसम अबतक,

कुछ निशानी जो मिली है,उन गुनाहो की हमें,
दिल ने संभाला है,ये तोहफा-ए-गम अबतक,

होश में आये जब,वाकिफ हुए,तेरी फितरत से,
बस समझ न पाये,तेरे जाने का सबब अबतक,

अब तुम्हें अपना कहे,या अमानत-ए-गैर समझे,
पर नादाँ दिल तुम्हें समझता है,अपना अबतक,

मै लिखता हूँ,अपने अश्कों को रोशनाई बनाके,
सब दर्द से भरी है,जो लिखी है गज़ले अबतक,

लौट आओ फिर करो,इज़हार-ए-मोहब्बत सनम,
बस इसी उम्मीद पे जिंदा है,शायद”मन”अबतक,
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मनोज सिंह”मन”

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