प्रार्थनायें क्या होतीं हैं
मन का विश्वास होतीं हैं
बंधती हुयी आस होतीं हैं 
कमल के पत्ते पे पड़ी ओस
बूंद सी साफ होतीं हैं
ऊषा किरण छूकर बहल
जाये,वो प्यास होतीं हैं
जाड़े की गुनगुनी धूप
सी सहला जातीं हैं
मां की मीठी लोरी सी
बहला जातीं हैं
वो प्रार्थना ही तो हैं
जो पूर्ण समर्पण हैं
और
जीवन जीने की शक्ति
बन जातीं हैं..
आभा चन्द्रा..

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