तुझे याद ना करू तो जिस्म टूटता है मेरा फ़राज़
उम्र गुजरी है तेरी याद का नशा करते करते…

जो भी दुख याद न था याद आया
आज क्या जानिए क्या याद आया।

याद आया था बिछड़ना तेरा  Read more

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना
मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना

ये शोलगी हो बदन की तो क्या किया जाये Read more

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

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ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
तेरा मिलना भी जुदाई कि घड़ी हो जैसे

अपने ही साये से हर गाम लरज़ जाता हूँ Read more

इस से पहले के बे-वफ़ा हो जाएं;
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएं;

तु भी हीरे से बन Read more

कितना आसां था तेरे हिज्र में मरना जाना;
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते।

हिज्र: जुदाई

बरसों के बाद देखा इक शख्स दिलरुबा सा
अभी जहन में नहीं है पर नाम था भला सा

अबरू खिंचे खिंचे से आखें झुकी झुकी सी Read more

मेरे सजदों में कमी तो नहीं थी ‘फ़राज़’,
क्या मुझ से भी बढ़ के किसी ने माँगा था उसको…

मेरे लफ़्ज़ों की पहचान अगर कर लेता वो ‘फ़राज़’
उसे मुझसे नहीं खुद से मुहब्बत हो जाती…

किस-किस को बतायेंगें जुदाई का सबब हम,
तू मुझसे खफ़ा है तो ज़माने के लिए आ…

जिस कश्ती के मुक़द्दर में हो डूब जाना फ़राज़;
तूफानों से बच भी निकले तो किनारे रूठ जाते है…

ऐसे चुप है कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे​;​
​तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे​;​​​
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​​अपने ही साये से हर कदम Read more

चीखें भी यहाँ गौर से सुनता नहीं कोई,
अरे, किस शहर में तुम शेर सुनाने चले आये…

काफिर के दिल से आया हूँ मैं ये देखकर,
खुदा मौजूद है वहाँ पर उसे पता नहीं…

उसकी आँखों को कभी गौर से देखा है फ़राज़,
रोने वालों की तरह जागने वालों जैसी…

यूँ तुझे ढूँढने निकले की ना आये खुद भी
वो मुसाफ़िर की जो मंजिल थे बजाये खुद भी

कितने ग़म थे की ज़माने Read more

ये मुहब्बत भी है क्या रोग फ़राज़,
जिसे भूले वो सदा याद आया…