बेचैनियों  को  दिल  की  पैग़ाम  कोई  तो  दे
मेरी  निकहतों  को  दिलबर काम कोई तो दे

हवा महकते गुलाब की या ख़ला  ही कर अता 
इन  डूबती  साँसों  को  अंजाम  कोई  तो  दे

बैठा  है  सिये  होंठ  बनी  है  जान  पर  मेरी
तोड़  कर  खामोशियाँ  इलज़ाम  कोई  तो दे

डाला है दिल पर बोझ किस कशमकश ने जाने
धड़कन की  ख़ैर  हो  कुछ  सलाम कोई  तो दे

साँसों  के  संग  आये  ख्वाबों  में  महक जाये
गुलशन-ए-जां  इस ख़ुश्बू का नाम कोई तो दे

था हर चिराग़ अहसास का अपनी लौ पर क़ायम
ला  फिर  इक  बार ठीक वैसी शाम कोई तो दे

जाते रहे जुगनू भी ‘सरु’इक इक करके अब तो
सियाह  रातों  को  माह-ए-तमाम कोई  तो  दे

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