ना इतराओ इतना,बुलंदियों को छूकर,
वक़्त के सिकंदर, पहले भी कई हुये,

जंहा होते थे कभी, शहंशाहो के महल,
वही देखे है हमने, उनके मकबरे बने हुये,

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मनोज सिंह “मन “

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