मोहब्बत में टूटे, तो फिर संभालना नही आया,
उनसे बिछड़े है जबसे, फिर मचलना नही आया,

मेरे दिल की,तासीर ही कुछ ऐसी रही कि,
उनसे किये वादों से, फिर मुकरना नही आया,

उनके जाने के बाद,तन्हाई का सहारा मिला है,
इसकी आगोश में आये, फिर निकलना नही आया,

उनकी फितरत ही रही, कुछ मौसम की तरह,
हमें,मौसम की तरह, फिर बदलना नही आया,

यू तो और भी बहुत,तलबगार थे,इस”मन”के
पर इश्क में पाबंद था, फिर बहकना नही आया,
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मनोज सिंह”मन”

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