राधा सुकुमारी
प्यार से भी प्यारी
कान्हा के मुरली के तनो पर झुमती ये बृज दुलारी 
जमुना के तीरे
अपने पावन नजरो से
बस कान्हा को ही ताके
वो भी क्या समय था
ना शब्द था ना सिकायत
बस था तो एक मधुर पावन सा मोहब्बत
मुरली की हर तान उनकी मोहब्बत की बात सुनती है
ये सौम्य सुभाव पकृति भी पूरणता साथ निभाति है।

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