मेरे घर के रास्ते में नदिया नहीं बहती है
वक़्त की धूल है जो उँगलियों से झरती है

ले सको तो ले लो अपने दुःख औ अपने सुख
कोई भी शै देर तक एक जगह नहीं रूकती है

खिड़कियां बंद दरवाज़ों पर लग गए है ताले
यहाँ हवा भी अपना अपना मज़हब चुनती है

मुझसे कहा कि तेरे वास्ते मैं ठहरा ही रहा
देखा उसकी नज़रें भी कहीं सज़दा करती हैं

घर हुए खंडहर , कोने कोने लगे हैं जाले
तेरी ज़िन्दगी “आभा” इन सबमें बहती हैं
आभा….

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2 comments on “Mere Ghar Ke Raaste Mein…

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    Grhat yar kaha SE idia late ho

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