एक अनजाना सा भय है आज मेरे मन में,
अपनी मंजिल की डगर में कि अगले पल क्या होगा |

जवाब ढूँढता हूँ मैं, इन वीरान राहों में, 
कहीं तो होगा जवाब मेरा, पेड़ की छांव में |

आँखे दूर तलक जाती हैं, लौट आती हैं खाली हाथ,
डूब जाता हूँ मैं मायूसी में शाम होने के साथ |

आँखे थकीं हैं, लेकिन मन नहीं ,
मैं ढूँढ लूँगा वो छांव जहाँ विश्राम कर रहा है, “मेरा जवाब” ||

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