अब्र की स्याही से लिखा लगता है,
भविष्य मेरे देश का,
कि जल कर ख़ाक हुआ जाता है,
अमन-ओ-चैन मेरे देश का ||

मेरा देश, जो सोने की चिड़िया हुआ करता था,
इतराता था अपने भाग्य पर,
तिनका तिनका बिखर रहा है,
अपने ही धागे से टूट कर ||

कभी जो तरुण भारत के युवा नेता थे, सीने में
जज़्बा-ए-तरक्क़ी का जूनून लिए,
आज बैठे हैं कुंडली मार कर,
इस देश को डसने के लिए ||

कहाँ गयी वो जयप्रकाश की सीख,
वो सुभाष का पागलपन,
शेखर का बलिदान, औ,
भगत सिंह का दीवानापन ||

सुखदेव, अशफाक़, राजगुरु तो फिर न हुए,
हम शर्मिंदा हैं ऐ वतन,
जातियों में बंटता देश,
धू – धू कर जलता चमन ||

ना जाने हम कब समझेंगे,
कि, ये वतन हम सबकी माँ है,
हिन्दू, मुसलमां, सब इसी जननी की कोख से,
जन्मे इक ‘इंसा’ हैं ||

क्यों नफ़रत का पौधा सींचते हो अपने दिलों में,
चंद नेताओं के कहने पर ?,
जा कर पूछो उनसे, क्या उनका कोई अपना,
ज़ाया हुआ है सरहद पर ?

अदना सा हूँ, पर गुज़ारिश करता हूँ दोस्तों,
ग़र ये समझ पाओ,
कि मादर-ए-वतन की हिफ़ाज़त तुम्हारा धर्म है,
इसे अंदरूनी लड़ाइयों में ना गंवाओ ||

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