हमसे पूंछो शायरी मांगती है कितना लहू,
लोग समझते हैं कि धंधा बड़े आराम का है।

तुम जिंदगी में आ तो गए लेकिन इतना ख़याल रखना,
कि हम जान तो दे देते हैं लेकिन जाने नहीं देते।

कभी पिघलेंगे पत्थर भी मोहब्बत की तपिश पाकर,
बस यही सोच कर हम पत्थर से दिल लगा बैठे ।

हाँ याद आया उसके आखिरी अल्फ़ाज यही थे,
अब जी सको तो जी लेना मर जाओ तो बेहतर है।

ख्वाब आँखों से गए और नींद रातों से गयी,
वो जिंदगी से गए और जिंदगी हाथों से गयी।

नहीं फुर्सत यक़ीन मानो हमें कुछ और करने की,
तेरी यादें, तेरी बातें, बहुत मसरूफ रखती हैं।

वजह पूछोगी तो उम्र गुजर जाएगी,
कहा ना कि..अच्छी लगती हो तो बस अच्छी लगती हो।

हमारा कत्ल करने को मीठी जुबान है काफी,
अजीब शख्स है वो जो खंजर तलाश करता है।

आँख खुली तो जाग उठी हसरतें तमाम,
उसको भी खो दिया जिसको पाया था ख्वाव में।

मुझे बदनाम करने का बहाना ढूँढ़ते हो क्यों,
मैं खुद हो जाऊंगा बदनाम
पहले नाम होने दो।

चलती हैं दिल के शहर में यूँ ही हुकूमतें,
बस जो भी उसने कह दिया दस्तूर हो गया।

आओ मिलकर मोहब्बत को आग लगा दें,
कि फिर ना तबाह हो किसी मासूम की जिंदगी।

वो लौट आयी मेरी ज़िंदगी में अपने मतलब के लिये,
और मैं ये सोंचता रहा कि मेरी दुआओं में दम था।

शिकवा तो यूँ करते हो जैसे बस मेरे ही हो तुम,
कभी खुद से पूछो मेरी बरबादियों का सबब क्या था।

गिरना भी अच्छा है, औकात का पता चलता है,
बढ़ते हैं जब हाथ उठाने को, अपनों का पता चलता है।

सरक गया जब उसके रुख से पर्दा अचानक,
फ़रिश्ते भी कहने लगे काश हम भी इंसां होते।

मोहब्बत भी बड़ा अजीब खेल है,
जो सीख जाता है, वही हार जाता है।

इश्क अभी पेश ही हुआ था इंसाफ के कटघरे में,
सभी बोल उठे यही कातिल है… यही कातिल है…