तुम लाख़ कोशिशें करलो ‘आकाश’, अब कभी ना हो पायेगी सुलह,
गर फ़िर भी मिलना चाहो, तो मिलते रहना एक अजनबी की तरह…

सब के कहने से इरादा नहीं बदला जाता
हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता

हम तो शायर हैं सियासत नहीं आती हमको  Read more

अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं
जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी-चादर उठाते हैं

तुम्हारे शहर में मय्यत को सब काँधा नहीं देते Read more

तुम मुझ पर लगाओ मैं तुम पर लगाता हूँ,
ये ज़ख्म मरहम से नही इल्ज़ामों से भर जायेंगे. ~a~

मधुशाला भाग – 6 (हरिवंश राय बच्चन)

साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
क्यों पीने की अभिलाषा से, करते सबको मतवाला,
हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,  Read more

मधुशाला भाग – 5 (हरिवंश राय बच्चन)

ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला,
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले   Read more

मधुशाला भाग – 4 (हरिवंश राय बच्चन)
कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला,
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है, Read more
मधुशाला भाग – 3 (हरिवंश राय बच्चन)
वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में, Read more
मधुशाला भाग – 2 (हरिवंश राय बच्चन)
बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,  Read more
मधुशाला भाग – 1 (हरिवंश राय बच्चन)
मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,  Read more
चोट कड़ी है काल प्रबल की,
उसकी मुस्कानों से हल्की,
राजमहल कितने सपनों का पल में नित्य ढहा करता है|
मुझ से चाँद कहा करता है– Read more

ना लफ़्ज़ों का लहू निकलता है ना किताबें बोल पाती हैं,
मेरे दर्द के दो ही गवाह थे और दोनों ही बेजुबां निकले…

जो अधूरी रह गयी थी वो कहानी सोचना,
कभी बैठकर तन्हा अपनी बातें पुरानी सोचना…

यकीन है के ना आएगा मुझसे मिलने कोई,
तो फिर ये दिल को मेरे इंतज़ार किसका है…

blueHeart

वो हाथ कुछ अजीब से लगते हैं किसी और के हाथों में,
जिन हाथों की चूड़ियाँ कभी टूटी थी मेरे ही हाथों में…

कल रात फिर से ख्वाब में तुम आये मगर,
सुनो अपनी मजबूरियां साथ ना लाया करो… ~a~

एक याद है तेरी जो सम्भाली नहीं जाती,
एक क़र्ज़ लिया जो अदा हो नहीं सकता…

फिर से तेरी यादें मेरे दिल के दरवाजे पे खड़ी हैं,
वही मौसम, वही सर्दी, वही दिलकश ‘जनवरी’ है…♥

अभी तो दिल में हल्की सी ख़लिश महसूस होती है,
बहुत मुमकिन है कल इसका मुहब्बत नाम हो जाए…