माना महरूम हुये है हम तेरी चाहत से,
मगर यकीं उठा नही है अभी मोहब्बत से,

जब भी दिख जाओगे कंही राहों में हमें,
देखा करेंगे हरदम तुम्हें बड़ी हसरत से,

कसम निभाने की  हमें बुरी आदत है,
हम मजबूर है बहुत  अपनी फितरत से,

ज़िक्र किया था कंही पे तुमने मेरा कभी,
सब समझते है तेरा मुझे इसी गफ़लत से,

बात दिल की बता देना हमें  तुम भी कभी,
जब मिल बैठेंगे हम दोनों कंही फुरसत से.
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मनोज सिंह”मन

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