#G4.

क्यूँ खोये खोये से मेरे दिलदार नज़र आते हैं,
कोई कह दे हम उनके दीदार को इधर आते हैं,

हथेली में मेरी अक्सर काँटे चुभाने वाले, 
दामन में महबूब के गुल ए गुलज़ार नज़र आते हैं,

ये तो साज़ ए तराना मेरे हाथ में उल्फ़त का है,
कभी देख जो ज़िन्दगी मेरी, टूटे तार नज़र आते हैं,

यूँ तो होता हूँ ग़ुम हर पल यादों में तेरी ही,
शब ए फुरक़त पलकों पे, अश्क़ ए ख़ार नज़र आते हैं,

वो नहीं करते लफ्ज़ों में बयाँ हकीक़त ए दिल अपनी,
नज़रों में सनम के आरज़ू ओ ख्वाब नज़र आते हैं,

मेरा कलाम ए फर्ज़ वो, जो मुझको कभी अर्ज़ किया नही करते,
क़िस्से ग़र बदनामी के हों, ग़ुमनाम सरे बाज़ार नज़र आते हैं… ग़ुमनाम

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