उल्फ़त में ग़म के ख़ज़ाने क्या- क्या निकले
हम अपनी आँखों को दिखाने क्या- क्या निकले

समझा था ये दिल तो उसे ही मंज़िल अपनी 
मंज़िल से आगे भी ठिकाने क्या- क्या निकले

हाय इक ज़रा मेरे लब खुलने की देर थी
फिर महफ़िल में जाने फसाने क्या-क्या निकले

तेरी ख़ुश्बू में खो गये जो उन लम्हों से
क़िताब-ए-हसरत में लिखाने क्या- क्या निकले

भरते थे जो दम कभी अपनी इक- इक बात का
उसी जुबां से आज बहाने क्या- क्या निकले

ना जाना इक उम्र तक दिल जिगर सब चाक़ हैं
हम चादर तक़िए और सिलाने क्या -क्या निकले

फूलों का इक शहर और झूलों का गांव भी
‘सरु’ खुशियों के वो पल बसाने क्या -क्या निकले
–suresh sangwan ‘saru’

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