तपती आंखो में कहां जीते हैं ख्वाब
धूप की जलन तो कहां पलते हैं ख्वाब

ख्वाहिशों की नर्म छांव में बैठे बैठे 
आस टूट जाती है तो टूटते हैं ख्वाब

रूई के फाहे से हल्के हल्के गाले
आंधी चलती है तो उड़ते है ख्वाब

वो दे रहा है बातों बातों में वादे
धोखा देने को मुझे छलते हैं ख्वाब

सोच लिया था “आभा” मैने पहले से
ज़िंदा रहने को यहां कब मिलते है ख्वाब
आभा….

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