इत्तफाक से हमने कुछ दूर से ही देखा था उन्हे उस रोज़, यूँ निगाह बदलते बदलते…
के आज तक हमारी धड़कने बगावत करती आई है हमसे हर रोज़, हमें कोई गैर समझते समझते…

अच्छा ही था जो करीब से ना गुजरे… वरना,
बन्दा तो कब का परवरदिगार का मुलाजिम हो चुका था यूँ बेगैरत-ईमान फिसलते फिसलते…

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